दो शेर

हर बार गया जीत वो झूठा मिरे आगे
हर बार गया हार वो सच्चा मिरे आगे

सब झिड़कियाँ खामोशी से सह जाते थे बेटे,
अब बोल रहा है मेरा बेटा मिरे आगे ।

सूबे सिंह “सुजान”

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शोध आलेख ( कवितालयों की आवश्यकता है)

शोध लेख *कवितालयों की आवश्यकता*

*कवितालयों की तीव्र आवश्यकता है*
जिस तरह अस्पताल व पुलिस स्टेशनो की जरूरत है
उसी तरह से समाज को कवि व कविताओं की की जरूरत है।
कविता समाज की जुबान होती है कविता के माध्यम से समाज अपनी बात कह पाता है अपनी भावनाओं को मासूमियत व नाजुकी से  कह व सुन पाता है ।
अपनी बात कहने को तो हम सारा दिन आपस में न जाने कितना बोलते हैं और किसी समय बोलने के कारण ही आपस में प्यार करते हैं या लड़ाई कर बैठते हैं हर प्रकार के व्यक्ति होते हैं कुछ व्यक्ति बहुत कम बोलना पसंद करते हैं तो कुछ बोलने से रोके नहीं रुकते, अर्थात मनुष्य बिना बोले या बातें किये रह नहीं सकता हर काम करने के लिए मनुष्यों को एक दूसरे पर निर्भर होना पड़ता है यही प्रक्रिया समाज का निर्माण करती है ।
*अब बात करते हैं समाज व कविता का संबंध पर और उसकी आवश्यकता पर* ।
मनुष्यों को जितनी जरूरत स्वास्थ्य के लिए डॉक्टर,अस्पतालों की पड़ती है उसके पीछे बीमारियाँ कारण होती हैं लेकिन बीमारियाँ होती ही क्यों हैं इनके होने के कारण को पता तो करना चाहिए कुछ बीमारियाँ वायरस आदि से होती हैं लेकिन वर्तमान टेक्नोलॉजी के युग में मनुष्य का भी मशीनीकरण हो गया है जिसकी वजह से अधिकतर बीमारियाँ मनुष्य द्वारा अपने शारीरिक अंगों का समुचित प्रयोग न करना या विपरीत दिशाओं में प्रयोग करना जो प्राकृतिक नहीं होता जिससे अनेकानेक बीमारियाँ पैदा होती हैं  इन बीमारियों से निजात पाने के लिए हमें बहुत सी क्रियाओं को करना पड़ता है जो हमारे मन मस्तिष्क पर असर डालती हैं कविता भी उन्हीं क्रियाओं में से सबसे मुख्य होती है  तो क्यों नहीं हम इन कारणों के लिये कविता,कहानी जैसी सार्थक क्रियाओं को प्रभावी बनायें और जिस प्रकार सरकार अस्पताल,पुलिस स्टेशन पर बजट खर्च करती है उसी प्रकार “कवितालय” बनाये जायें जहाँ पर लोगों को कविता सुनाकर उनके तनाव,मानसिकता रोगों को,काम के बोझ से पैदा हुए रोगों से निराकरण किया जा सके तथा साथ ही साथ मोबाइल वैन की तरह कवि उपलब्ध करवाये जायें जो समाज की आवश्यकता को वहीं जाकर पूरी करें ।
कविता मानव मन मस्तिष्क पर प्राकृतिक रूप से प्रभाव डालती है और मनुष्य की गलत आदतों में सुधार लाती है तथा अप्राकृतिक कार्य करने से रोकती है और मनुष्य को प्राकृतिक बनाती है प्राकृतिक रूप से बहने वाली हर वस्तु,मनुष्य,समाज स्वयं स्वस्थ हो जाता है कविता मनुष्य को परिभाषित करती है जिससे वह रूकता नहीं,समाज में बाधा नहीं आती और मनुष्य सकारात्मक होता जाता है ।
कवितालयों का निर्माण करके उनमें सार्थक व सकारात्मक कवियों को उपलब्ध करवाया जाना चाहिए यह कवि,शायर कविता,ग़ज़ल स्वयं कहेंगे व इतना ही नहीं समाज के लोगों को कविता कहने के लिए प्रोत्साहित करेंगे जैसे मानसिक डॉक्टर इलाज करता है उसी प्रकार बिना प्रयोगशाला के मानसिक रूप से कमजोर व्यक्तियों का इलाज तो होगा ।
जिस मनुष्य को परिभाषित किया जायेगा वह स्वस्थ हो जाएगा हमें कविता के माध्यम से मनुष्यों को और समाज को परिभाषित करना होगा ।
“*कवितालयों का निर्माण करने की बात बेशक आपको प्रारंभ में अटपटी लगे लेकिन यह वर्तमान समाज की के लिए बेहद जरूरी है*”
*सूबे सिंह सुजान*
*कुरूक्षेत्र हरियाणा*
@यह शोध लेख सर्वाधिकार सुरक्षित है सूबे सिंह सुजान के ब्लॉग पर ।

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कमजोर बुद्धिमत्ता मानवता लिए खतरनाक होती है ।

यह भी देखने में आता है कि आदमी किसी भाषा को सीखते सीखते कैसे उस कल्चर का हो जाता है ?
*वास्तव में तो यह मनुष्य की हीनता ही है कि वह वास्तविकता को भूलकर सिर्फ़ भाषा के आधार पर अपने विचारों को सांझा करता है*

इस बात में अंग्रेजी सत्ता से अंग्रेजी भाषा का पनपना,और अशिक्षित लोगों द्वारा अंग्रेजी बोलने को ही बुद्धिमत्ता से जोड़ना सजग उदाहरण है ।

आदमी जब सकारात्मक रूप व्यावहारिक,तत्थयात्मक रूप से कमजोर होता है तो वह भाषा,धर्म,क्षेत्र,जातियों के आधार पर अपने विचारों को बदलता है और सही व गलत का अंतर भूल जाता है ।

यह इस प्रकार भी मानव का व्यवहार समझा जा सकता है जब युवा लड़के की शादी नहीं होती तो उसे अपनी माता पर बेहिचक भरोसा होता है ,लगाव होता है लेकिन जब शादी हो जाती है तो वह अपनी पत्नी की सभी बातें सत्य,और माता पिता ,बहन ती सब बातों में संशय देखने लगता है ।लेकिन सब नहीं,इससे यही पता चलता है कि जो मानसिक रूप से ,व्यावहारिक रूप से कमजोर होगा वह उस प्रभाव में आता ही है ।
लेकिन जो मानसिक रूप से,व्यावहारिक रूप से परिपक्वता को प्राप्त है वह सत्य को समझकर ही बात रखेगा ।

सूबे सिंह सुजान

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उसने कहा कि फूलों बहारों को देखना

उसने कहा कि फूलों बहारों को देखना

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Welcome you and thanks

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ग़ज़ल, इस तरह पास आ के बैठे हैं

इस तरह पास आ के बैठे हैं
वो पहेली बना के बैठे हैं ।

उनको भी देखना नहीं नाटक
हम भी पर्दा गिरा के बैठे हैं

हो गई गलती,शर्म भी आयी,
इसलिए दूर जा के बैठे हैं

झूठ पकड़ा गया जब उनका तो,
वो लड़ाई बजा के बैठे हैं ।

फर्क उनको तो कुछ नहीं पड़ता,
और हम दिल जला के बैठे हैं

आग हमने लगाई है सच की
हाथ अपने जला के बैठे हैं

हम तो दुनिया को छोड़ आये थे ,
आप ही दूर जा के बैठे हैं ।

सूबे सिंह सुजान

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और हम , दिल जला के बैठे हैं

और हम दिल जला के बैठे हैं

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