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ग़ज़ल -गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ

 

गण हुए तंत्र के हाथ कठपुतलियाँ
अब सुने कौन गणतंत्र की सिसकियाँ

इसलिए आज दुर्दिन पड़ा देखना
हम रहे करते बस गल्तियाँ गल्तियाँ

चील चिड़ियाँ सभी खत्म होने लगीं
बस रही हर जगह बस्तियाँ बस्तियाँ

जितने पशु पक्षी थे, उतने वाहन हुए
भावना खत्म करती हैं तकनीकियाँ

कम दिनों के लिए होते हैं वलवले
शांत हो जाएंगी कल यही आँधियाँ

अब न इंसानियत की हवा लग रही
इस तरफ आजकल बंद हैं खिड़कियाँ

क्रोध की आग है आग से भी बुरी
फूँक दो आग में मन की सब तल्ख़ियाँ

इक नज़र खुश्क मौसम पे जो डाल दो
बोलना सीख जायेंगी खामोशियाँ

रास्ता अपने जाने का रखने लगीं
आजकल घर बनाती हैं जब लड़कियाँ

प्रश्न यह पूछना आसमाँ से “सुजान”
निर्धनों पर ही क्यों गिरती हैं बिजलियाँ

सूबे सिंह “सुजान”

कुरूक्षेत्र,हरियाणा

मोबाइल नंबर , 9416334841

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The driving force in everyone’s life is accurate permanent happiness

Once upon a time, there lived a boy called Jai who was very popular among his family, friends and teachers at school. He was a good leader, a gurade ‘A’ student, an all-rounder and a good role model for all the students. Everybody loved him so much, it was almost as if he had cast a spell on those around him.

Raj, one of Jai’s friends, once decided to find the secret to Jai’s success. With this intention in mind, he visited Jai’s house. He found Jai”s room to be very simple and neat. On one of the walls in the room hung a large, homemade plaque with the words, ‘I am third’ on it. When Raj asked Jai what it meant Jai replied, “That is the motto by which I try to live. It has made my life very easy and stress-free. It means that God is first, others are second and I am third.”

Moral: The driving force in everyone’s life is to acquire permanent happiness, which can be achieved only by living according to God’s will. As one puts the needs and pleasures of others (parechchha) before his own (swēchhā), one gradually begins to understand God’s wish (Īshwarēchhā) and is soon able to follow it.

Happy Morning.Keep Smiling.😊😊😊

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ग़ज़ल सपने हैं काँच के

सपने हैं काँच के जरा रखना संभाल कर
जीना पड़ेगा,दिल से,महब्बत निकाल कर

मैंने कहा था इतना कि चलना संभाल कर
वो देखने लगे मुझे आँखें निकाल कर

मुझसे जो दोस्ती करो तो ध्यान रखना ये
किस्मत को आँकना मेरी सिक्का उछाल कर

कीटाणु दिल के पानी में इतने पनप गये
पीने दे अब मुझे भी महब्बत उबाल कर

अपनी ग़ज़ल में मैं तेरी बातें भी करता हूँ
ग़ज़लों को सुन मेरी, और खुद को निहाल कर

अपनी कहानी कहनी है तो कहना अपने आप
लेखक नहीं कहे तो न इसका मलाल कर

चालाकियाँ पहुँच गई ऐसे मुकाम पे
सब खेलते हैं ताश से पत्ते निकाल कर

क्या प्यार है कि दोस्त भी पहचानते नहीं
चेहरे पे मेरे कौन गया रंग डाल कर

ऐ आने वाली नस्लों तुम्हें हैं संभालने
हम दे रहे तुम्हें नये रस्ते निकाल कर

    *सूबे सिंह “सुजान”*
*कुरूक्षेत्र हरियाणा*
*मोबाइल*  *9416334841*
*email* *subesujan21@gmail.com

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दो शेर

हर बार गया जीत वो झूठा मिरे आगे
हर बार गया हार वो सच्चा मिरे आगे

सब झिड़कियाँ खामोशी से सह जाते थे बेटे,
अब बोल रहा है मेरा बेटा मिरे आगे ।

सूबे सिंह “सुजान”

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शोध आलेख ( कवितालयों की आवश्यकता है)

शोध लेख *कवितालयों की आवश्यकता*

*कवितालयों की तीव्र आवश्यकता है*
जिस तरह अस्पताल व पुलिस स्टेशनो की जरूरत है
उसी तरह से समाज को कवि व कविताओं की की जरूरत है।
कविता समाज की जुबान होती है कविता के माध्यम से समाज अपनी बात कह पाता है अपनी भावनाओं को मासूमियत व नाजुकी से  कह व सुन पाता है ।
अपनी बात कहने को तो हम सारा दिन आपस में न जाने कितना बोलते हैं और किसी समय बोलने के कारण ही आपस में प्यार करते हैं या लड़ाई कर बैठते हैं हर प्रकार के व्यक्ति होते हैं कुछ व्यक्ति बहुत कम बोलना पसंद करते हैं तो कुछ बोलने से रोके नहीं रुकते, अर्थात मनुष्य बिना बोले या बातें किये रह नहीं सकता हर काम करने के लिए मनुष्यों को एक दूसरे पर निर्भर होना पड़ता है यही प्रक्रिया समाज का निर्माण करती है ।
*अब बात करते हैं समाज व कविता का संबंध पर और उसकी आवश्यकता पर* ।
मनुष्यों को जितनी जरूरत स्वास्थ्य के लिए डॉक्टर,अस्पतालों की पड़ती है उसके पीछे बीमारियाँ कारण होती हैं लेकिन बीमारियाँ होती ही क्यों हैं इनके होने के कारण को पता तो करना चाहिए कुछ बीमारियाँ वायरस आदि से होती हैं लेकिन वर्तमान टेक्नोलॉजी के युग में मनुष्य का भी मशीनीकरण हो गया है जिसकी वजह से अधिकतर बीमारियाँ मनुष्य द्वारा अपने शारीरिक अंगों का समुचित प्रयोग न करना या विपरीत दिशाओं में प्रयोग करना जो प्राकृतिक नहीं होता जिससे अनेकानेक बीमारियाँ पैदा होती हैं  इन बीमारियों से निजात पाने के लिए हमें बहुत सी क्रियाओं को करना पड़ता है जो हमारे मन मस्तिष्क पर असर डालती हैं कविता भी उन्हीं क्रियाओं में से सबसे मुख्य होती है  तो क्यों नहीं हम इन कारणों के लिये कविता,कहानी जैसी सार्थक क्रियाओं को प्रभावी बनायें और जिस प्रकार सरकार अस्पताल,पुलिस स्टेशन पर बजट खर्च करती है उसी प्रकार “कवितालय” बनाये जायें जहाँ पर लोगों को कविता सुनाकर उनके तनाव,मानसिकता रोगों को,काम के बोझ से पैदा हुए रोगों से निराकरण किया जा सके तथा साथ ही साथ मोबाइल वैन की तरह कवि उपलब्ध करवाये जायें जो समाज की आवश्यकता को वहीं जाकर पूरी करें ।
कविता मानव मन मस्तिष्क पर प्राकृतिक रूप से प्रभाव डालती है और मनुष्य की गलत आदतों में सुधार लाती है तथा अप्राकृतिक कार्य करने से रोकती है और मनुष्य को प्राकृतिक बनाती है प्राकृतिक रूप से बहने वाली हर वस्तु,मनुष्य,समाज स्वयं स्वस्थ हो जाता है कविता मनुष्य को परिभाषित करती है जिससे वह रूकता नहीं,समाज में बाधा नहीं आती और मनुष्य सकारात्मक होता जाता है ।
कवितालयों का निर्माण करके उनमें सार्थक व सकारात्मक कवियों को उपलब्ध करवाया जाना चाहिए यह कवि,शायर कविता,ग़ज़ल स्वयं कहेंगे व इतना ही नहीं समाज के लोगों को कविता कहने के लिए प्रोत्साहित करेंगे जैसे मानसिक डॉक्टर इलाज करता है उसी प्रकार बिना प्रयोगशाला के मानसिक रूप से कमजोर व्यक्तियों का इलाज तो होगा ।
जिस मनुष्य को परिभाषित किया जायेगा वह स्वस्थ हो जाएगा हमें कविता के माध्यम से मनुष्यों को और समाज को परिभाषित करना होगा ।
“*कवितालयों का निर्माण करने की बात बेशक आपको प्रारंभ में अटपटी लगे लेकिन यह वर्तमान समाज की के लिए बेहद जरूरी है*”
*सूबे सिंह सुजान*
*कुरूक्षेत्र हरियाणा*
@यह शोध लेख सर्वाधिकार सुरक्षित है सूबे सिंह सुजान के ब्लॉग पर ।

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