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ग़ज़ल सपने हैं काँच के

सपने हैं काँच के जरा रखना संभाल कर जीना पड़ेगा,दिल से,महब्बत निकाल कर मैंने कहा था इतना कि चलना संभाल कर वो देखने लगे मुझे आँखें निकाल कर मुझसे जो दोस्ती करो तो ध्यान रखना ये किस्मत को आँकना मेरी … पढना जारी रखे

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